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अनपढ़ गाँव का छोरा,

अनपढ़ गाँव का छोरा,
गौमाता संग खेत गया,
शहर पढ़ा जो बाबू बनकर,
अपनी जड़ों से दूर गया।

अब अंग्रेज़ी में ज्ञान बाँटे,
“कल्चर” का भाषण देता है,
माँ हिंदी में बात करे तो,
चेहरा उसका बदलता है।

गाय खड़ी है भूखी बाहर,
उसको रोटी कम मिलती,
लेकिन घर के पालतू डॉगी की,
हर महीने पार्टी चलती।

गाँव का पानी “गंदा” लगता,
मटके की ठंडक भूल गया,
बोतल वाले पानी खातिर,
जेब का पैसा खोल गया।

जिस मिट्टी ने चलना सिखाया,
उस मिट्टी को ही धूल कहा,
दो किताबें क्या पढ़ ली उसने,
खुद को सबसे “कूल” कहा।

व्यंग्य नहीं शिक्षा पर ये,
ना शहरों से बैर है,
बस अपनों को भूल जाना ही,
आज का सबसे बड़ा अंधेर है।

डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र

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