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यशोदरा

लो यशोधरा आज द्रवित हुई
उसके हिस्से में जमीन आई,
बुद्ध ने राह पकड़ ली ईश्वर की
छोड़ गए उसके लिए जग हसाई ।।

वह जानती थी बुद्ध के मन को
उनके पांव की गति रोक न पाई,
इस दुनिया के ताने किए सहन ,
कि पल्लू में पति को ना बांध पाई ।।

जग जीत गई अकेले ही यशोधरा
उसके दिल का कोना सुना हुआ
आजादी कहां है मेरे परमेश्वर बता
स्त्री का जन्म ही बस हुआ रोना ।।

प्रभु शरण में वह चाहती तो
जाकर बैठ जाती सब छोड़ के,
पर वह ऐसा नहीं कर पाई ऐसा
ममता में ही ,ईश्वर की शरण पाई ।।

यशोधरा जीत गई आज देखो
जब बुद्ध ने ईश्वर की शरण पाई
अध्यात्म से जोड़कर सबको ही ,
गृहस्थ जीवन की भी महत्वता बताई ।

©®प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका )
ग्वालियर , मध्य प्रदेश

सर्वाधिकार सुरक्षित।

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