
उभर के दिल से बही आंखों से होकर गुजरी।
वो धारा प्रेम के मोती भी पिरोकर गुजरी।।
मिज़ाज वक़्त का रूठा हुआ सा लगता है।
आस टूटी हुई मायूस थी रोकर गुजरी।।
फसल हरी है मैं तकता हूं हर पहर जिसको।
प्रेम के बीज कभी दिल में वो बोकर गुजरी।।
तरबतर सुनके ज़माना “विकल” ग़ज़ल मेरी।
मेरे अश्कों में कलम मुझको डुबोकर गुजरी।।
कवि विष्णु बाजपेई "विकल"
कटनी (म.प्र.)












