Uncategorized
Trending

स्त्री की व्यथा

जीने की चाह नहीं है
हर पल मौत को बुलाती हूँ।
जहर जैसी बातें सुनकर
जहर को भी पचा लेती हूँ।
बात कड़वी मगर सच है
रोज जहर के घुट पीकर जीती हूँ।
क्या बताऊं मैं अपनी व्यथा
किस हाल में मैं रहती हूँ।
ना पति का प्यार मिलता है
बस उनका तिरस्कार सहती हूँ।
बहुत दुखी हूं अपने जीवन से
आज अपने दिल की बात कहती हूँ।
पति के घर में रहकर शान से
उस घर को अपना घर मानती हूँ।
भूल जाती हूं यहां मेरा कोई भी नहीं
फिर भी सबको अपना समझती हूँ।
माथे में बिंदी हाथों में कंगन और बिछियां
मंगलसूत्र और कुमकुम रोज लगाती हूँ।
काम करते हुए भूल जाती हूं कि मैं स्त्री हूँ
पति का प्यार पाने को हर रोज तरसती हूँ।
क्या स्त्री को खुश रहना गुनाह है
ये खुद के आत्मा को सवाल करती हूँ।
चूड़ियों संग घड़ी पहनकर
रोटी पकाकर, रोटी कमाने जाती हूँ।
स्त्री धन नहीं है कुछ भी मेरे पास
ना जाने किसके लिए कमाने जाती हूँ।
सबको खुशियां बांटकर मैं खुद
सबसे ज्यादा दुखी हो जाती हूँ।
ऐसा लगता है मानो मशीन हूँ मैं
बिना थके दिन भर काम करती हूँ।
जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटती
हर काम को ईमानदारी से करती हूँ।
धन दौलत की चाह नहीं मुझको
स्त्री हूं सम्मान पाने को तरसती हूँ।
अपने टूटे हुए ख्वाबों को छुपाकर
सबके खुशियों की दुआएं करती हूँ ।
मत समझो कमजोर मुझे मैं स्त्री हूँ
वक्त आने पर चट्टान बन जाती हूँ।
मेरी व्यथा केवल पीड़ा नहीं है
मैं सहनशीलता की कहानी बन जाती हूँ।
मेरे हिस्से जब सवाल आते हैं
मैं रिश्तों की कसौटी पर उतर जाती हूँ।
सबका पेट भरने के लिए
रसोई की आग में जलती हूँ।
आँखों में समन्दर लेकर
आशुओं को पी जाती हूँ।
कभी बेटी बनकर अरमान भूल जाती हूँ
बहन बनकर हर दर्द को छुपाती हूँ।
पत्नी  बनकर पति का संसार सजाती हूँ।
माँ बन बच्चों के जीवन को महकाती हूँ।
हां मैं एक स्त्री हूँ अपनी व्यथा सुनाती हूँ।

अनिता महेश पाणिग्राही

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *