
मैं पतझड़ सा सुना सुना,
हरियाली के इंतज़ार में।
झेल रहा हूँ तापों को,
शीतलता के ख़याल में।
जब पतझड़ बीत जाएगी,
धरती मुस्कुरायेगी।
सूखी डाली की बाहों में,
नई कोंपलें आयेंगी।
दुखित मन के हर आहट को,
मंद बयार सहलाएगी।
पतझड़ के इस सूखे वन में,
फिर से बहारें आएँगी।
सुख का सावन आयेगा,
दुःख की बदरी छंट जायेगी।
मीठे फलों की गुच्छों से,
हर शाख लदती जाएगी।
मंज़िल वही पाता है,
जो धैर्य अपनाता है।
अंधियारा चाहे जितनी घनी हो,
सूरज फिर निकल जाता है।
जीवन के हर पतझड़ के बाद,
बसंत तो निश्चित आयेगा।
मन की इस अंधेरी कोठरी में,
फिर से उजाला छायेगा।
साहिल पे आना ही होगा,
पड़ी जो नाव मझधार में।
आशाओं के दीप जलेंगे,
खुशियों के झंकार में।
मैं पतझड़ सा सुना सुना,
हरियाली के इंतज़ार में।
झेल रहा हूँ तापों को,
शीतलता के ख़याल में।
रवि भूषण वर्मा












