
धरती पर जब पाप बढ़े, मन जब हो लाचार,
तब माँ गंगा बनकर आईं, लेकर निर्मल प्यार।
हिमगिरि की गोदी से निकली, कल-कल मधुर पुकार,
हर लेती हैं दुःख जगत के, भर देतीं उजियार।
जिसने भी श्रद्धा से माँ का पावन जल अपनाया,
सूखे मन के हर कोने में आशा दीप जलाया।
गंगा केवल धारा नहीं, माँ का स्नेह अपार,
इनकी लहरों में बसता है जीवन का विस्तार।
गंगा दशहरा का पर्व ये देता सुंदर ज्ञान,
मन को निर्मल रखो सदा, यही सच्चा स्नान।
आओ मिलकर प्रण ये लें, माँ का मान बढ़ाएँ,
गंगा जल सा पावन बनकर जीवन सफल बनाएँ।
मेरे भावों से निकली एक छोटी सी पुकार,
“माँ गंगे, रखना चरणों में अपना अटल दुलार।”
प्रोफसर सुषमा देवी गुप्ता












