
गीत
मुखड़ा :
मेरा मन मधुर मयूर सा, हरिद्वार मैं जाऊँ,
गंगा गुनगुन गूंजे गाथा, गंगा डुबकी लगाऊँ।
कल-कल करती कंचन धारा, करुणा कर बहती,
ममता-मयी माँ मृदुल मुसकाकर, मन की मैल हर लेती।
तन-तरल तरंगे तरसें, तट पर तृप्ति पाऊँ,
गंगा गुनगुन गूंजे गाथा, गंगा डुबकी लगाऊँ।
घाट-घाट गूंजे गगन में, गूढ़ गान गंभीरा,
हर-हर गंगे हर्षित होकर, हृदय हो हरषीरा।
भक्ति-भाव भरे भोर में, भावों में बह जाऊँ,
गंगा गुनगुन गूंजे गाथा, गंगा डुबकी लगाऊँ।
संत संग सत्संग सुनूँ, सुधा सी सरस सरिता,
मंत्र-मुग्ध मन मगन हो, मिटे मोह की ममता।
जीवन ज्योति जगमग जागे, जनम सफल बनाऊँ,
गंगा गुनगुन गूंजे गाथा, गंगा डुबकी लगाऊँ।
पावन पल पुलकित प्राणों में, प्रेम पुष्प खिलाएँ,
श्रद्धा-सुमन सजे संग-संग, सुख सागर लहराएँ।
माँ ममता में मिलकर मैं, मंगल गीत सुनाऊँ,
गंगा गुनगुन गूंजे गाथा, गंगा डुबकी लगाऊँ।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












