
बेटियाँ कब तक मरती रहेंगी,
और यूँ ही देखता रहेगा ज़माना?
कब तक खामोश रहेंगी गलियाँ,
कब तक सोया रहेगा ये आशियाना?
ए दुनिया! अब तो जल्दी जागो,
मानवता की लौ फिर से जलाओ।
अगर बहनों-बेटियों की रक्षा नहीं कर सकते,
तो शर्म से चूड़ियाँ पहन घरों में बैठ जाओ।
ये वही भारत है,
जहाँ कभी नारी को देवी माना जाता था,
जहाँ बहनों के सम्मान में
पूरा समाज सिर झुकाता था।
जहाँ बेटियाँ घर की लक्ष्मी कहलाती थीं,
ममता और संस्कारों की पहचान बनती थीं।
मगर आज उसी धरती पर
कितनी बेटियाँ जलाई जाती हैं,
कितनी बेबस चीखें
दीवारों में दफनाई जाती हैं।
कहीं दहेज की आग में
उनके सपनों को राख किया जाता है,
तो कहीं बेटे-बेटियों के फर्क में
उनके अस्तित्व को बाँट दिया जाता है।
कहीं उन्हें बोझ कहा जाता है,
कहीं उनकी इच्छाओं को कुचल दिया जाता है।
आखिर कब तक ये अन्याय चलता रहेगा?
कब तक इंसानियत यूँ ही मरती रहेगी?
क्यों आज भी बेटी के जन्म पर
कुछ चेहरों की मुस्कान फीकी पड़ जाती है?
क्यों बेटे के लिए जश्न,
और बेटी के लिए चिंता जताई जाती है?
क्या बेटी इंसान नहीं?
क्या उसके सपनों का कोई मोल नहीं?
क्या उसकी हँसी, उसकी जिंदगी
इस समाज के लिए अनमोल नहीं?
जब एक बेटी जन्म लेती है,
तो वो सिर्फ एक बच्ची नहीं होती,
वो किसी माँ की परछाईं होती है,
किसी पिता का अभिमान होती है।
वो घर की रौनक होती है,
रिश्तों की मिठास होती है।
फिर क्यों विवाह के बाद
उसी बेटी को पराया कर दिया जाता है?
क्यों उसके दर्द को
समझौते का नाम दे दिया जाता है?
कब तक दहेज के भूखे लोग
अपनी हवस में रिश्ते जलाते रहेंगे?
कब तक बहुओं की चीखों पर
समाज चुप्पी साधे रहेगा?
कब तक कानून कागज़ों में रहेगा,
और अपराधी खुलेआम घूमते रहेंगे?
अब वक्त आ गया है
कि समाज अपनी सोच बदले।
बेटियों को दया नहीं,
बराबरी और सम्मान मिले।
बेटों को यह सिखाया जाए
कि नारी कोई वस्तु नहीं,
वो भी एक इंसान है,
जिसे जीने का पूरा अधिकार है।
जागो ए दुनिया, अब और मत सोओ,
इन चीखों को अनसुना मत करो।
हर बेटी की सुरक्षा
अब समाज की जिम्मेदारी बनाओ।
वरना इतिहास पूछेगा एक दिन—
जब बेटियाँ जल रही थीं,
तब इंसानियत कहाँ सो रही थी?
जिस दिन हर घर में
बेटी और बेटे में फर्क मिट जाएगा,
जिस दिन दहेज लेने वाला
सम्मान नहीं, अपराधी कहलाएगा,
उस दिन सच में
भारत महान कहलाएगा।
रूपेश कुमार , युवा साहित्यकार
पाँच काव्य संग्रह प्रकाशित
चैनपुर, सीवान, बिहार












