
हवा हूं मैं हवा हूं शीतलता कि
दवा हूं,
तूफानों के साथ शोर मैं मचाती हूँ,
मन को ठंडक पहुंचाती हूं,
हवा हूं मैं हवा हूं शीतलता की
दवा हूं ।
जब मैं मंडराती हूं पेड़ पौधें भी
मंडराने लगते हैं,
फूल भी अपना खुशबू बिखेरे
सारा जहां महकाते है,
हवा हूं मैं हवा हूं शीतलता
की दवा हूं।
पंछी सुर मे गाती है भौंरे भी
गुनगुनाती हैं,
आसमानों कि काली घटाएं,
मुझको भी कुछ कहती हैं,
हवा हूं मैं हवा हूं शीतलता
की दवा हूं।
बारिश सुकून देती है मैं ठंडक
पहुंचाती हूं ,
रिमझिम बारिश संग मैं भी
नाचने लगती हूं,
हवा हूं मैं हवा हूं शीतलता की
दवा हूं।
मै दिखती नहीं हूं महसूस बस
होती हूं ,
प्राकृतिक सौंदर्य संग अपनी
सांसे छोड़ती हूं ,
हवा हूं मैं हवा हूं शीतलता कि
दवा हूं।
भीषण गर्मी से जो व्याकुल हैं
उनको राहत दिलाती हूं,
सरसराती आती हूं लहरों के
जैसे लहराती हूं,
हवा हूं मैं हवा हूं शीतलता कि
दवा हूं।
सूरज कि पहली भोर में कोयल
गीत सुनाती है,
मेरी ठंडी हवाओं से सारी पक्षी
चहचहाती हैं,
सबको प्राकृतिक पवन दिलाती हूं,
हवा हूं मैं हवा हूं शीतलता कि
दवा हूं।
मौसम सुहाना बनाती हूं,
हर एक मन को छू जाती हूं,
मैं हु हवाओं की रानी,
हवा बनके लहराती हूं,
हवा हूं मैं हवा हूं शीतलता कि
दवा हूं।
नलिनी शैलेन्द्र दास
सरायपाली छत्तीसगढ़












