
जहाँ मन में लोभ न रहता,
वहीं सुख का दीपक जलता।
जहाँ वाणी मधुर हो जाती,
वहीं शांति का फूल खिलता।
धन-दौलत से क्या मिलता है,
यदि मन हर पल रोता हो।
सच्चा सुख तो उस घर में है,
जहाँ प्रेम निरंतर होता हो।
क्रोध जहाँ मुस्कान बने,
अहंकार जहाँ झुक जाता हो।
थके हुए हर एक हृदय को,
अपनों का साथ मिल जाता हो।
नहीं चाहिए ऊँचे महल,
नहीं चाहिए सोने-चाँदी।
बस मन निर्मल, भाव पवित्र,
यही है जीवन की असली खेती।
सुख बाहर कहीं नहीं मिलता,
यह मन की सुंदर अवस्था है।
जिसने बाँटना सीख लिया,
उसके जीवन में ही शांति बसती है।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)












