Uncategorized
Trending

गंगा रूठ जाएं

हरिपद नख से निकली गंगा,
शिव के शीश समाई!
जटाशंकरी पाप समन कर,
मोक्ष दिलाने आई!!

धरती मां की प्यास बुझाकर,
औषधि अन्न उपजाती!
धन दौलत से हर घर भर कर,
सबकी भूख मिटाती!!

ऋषि मुनि संत सज्जन पर,
अनुपम स्नेह लुटाती!
धीरज धर्म ज्ञान ध्यान का,
है सन्मार्ग दिखाती!!

सदा पाप धोती सबके पर,
शर्म हमें न आई!
स्वार्थ में आकर दूषित करते,
करें कभी न सफाई!!

क्षोभ में आकर ‘जिज्ञासु’ जन,
गंगा रूठ न जाएं!
चली न जाएं छोड़ धारा को,
मिलकर इन्हें बचाएं!!

कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *