
कभी बिना कारण भी मन भारी हो जाता है,
अवसाद चुपके से भीतर घर बना जाता है।
छोटे-छोटे दुःख जब मन में जम जाते हैं।
अनकहे जज़्बात ही बोझ बन जाते हैं।
जब सपनों की राहें धुंधली हो जाती हैं,
अपनों की बातें भी चुभने लग जाती हैं।
थककर जब उम्मीदें भी सोने लगती हैं।
तब जीवन की धड़कन धीमी सी लगती है।
अवसाद तब आता जब खुद से दूरी हो,
मन में गहरी कोई अधूरी मजबूरी हो।
कभी अकेलापन इसका कारण बन जाता।
कभी असफलता मन को भीतर तक खा जाता।
पर हर अँधियारा सदा नहीं रह पाता है,
सूरज फिर से नई किरणें ले आता है।
बातें बाँटो, मन का बोझ हल्का कर लो।
विश्वास की डोरी से खुद को फिर जोड़ लो।
प्रकृति की गोद में कुछ पल बिताओ तुम,
अपनी पहचान को फिर से जगाओ तुम।
अवसाद की जंजीरें धीरे टूट जाएँगी।
जब हिम्मत की रोशनी राह दिखाएगी।
जीवन अनमोल है, यह याद रखो हर पल,
खुद से प्रेम करो, यही है सच्चा संबल।
मुस्कान की एक किरण भी दिशा बदल देती है।
हौसलों की छोटी लौ ही जीवन संवार देती है।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












