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आखिर कौन हूँ मै?

रख सको तो एक निशानी हूँ मै,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मै।
रोक ना पाए जिसको यह सारी दुनियां,
वह एक बूंद आँख का पानी हूँ मै।

सबको प्यार देने की आदत हैँ हमें,
अपने अंदर झांकने की आदत हैँ हमें।
जितना भी गहरा गम हो,
उतना ही मुस्कुराने की आदत हैँ मुझें।

भीड़ भरी दुनियां में अकेला खामोश हूँ मैं,
सब सवाल से खफा, छोटा सा जवाब हूँ मैं।
जो समझ न सके मुझें, उसके लिए कौन,
जो समझ गए उनके लिए खुली किताब हूँ मैं।

आँख से देखोगे तो खुश पाओगे,
दिल से पूछोगे तो दर्द का सैलाब हूँ मैं।
अगर रख सको तो एक निशानी हूँ मैं,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं।

न नाम का मोहताज, न शोहरत का भूखा
बस एक सुकून की तलाश में भटकता हूँ।
जो मिल गया उसे बाँट देता हूँ सबको
और जो छिन गया, उसे भूल के चलता हूँ।

आईने से पूछता हूँ रोज़ एक सवाल
“तू वही है जो कभी हँसा करता था?”
आईना चुप रहता है, बस आँखें नम हो जाती हैं
शायद जवाब उसके पास भी नहीं होता।

दुनिया कहती है “मजबूत बनो, टूटना मत”
मैं टूट के भी लोगों को जोड़ता रहता हूँ।
अपने ज़ख्म छुपा के दूसरों का मरहम बनता हूँ
यही मेरा हुनर है, यही मेरा गुनाह हूँ।

अगर मिलूँ कहीं, तो पहचान लेना मुझे
शोर में खामोश, भीड़ में अकेला खड़ा हूँ।
मैं वो हूँ जो सबके लिए जीता है
और खुद से पूछता है “आखिर कौन हूँ मैं?”

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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