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सखी! तुम ब्याह करना उस दिन!

तुम ब्याह करना उस दिन!
जिस दिन तुम्हारा मन सहमत हो जाए
एक नई जिंदगी में कदम रखने को!
एक ऐसी दुनियां जहां ………
तुम्हारा अस्तित्व शायद समाप्त हो जाए!
जिस दिन तुम खुद तैयार हो जाना
अपना बचपन और अपना आंगन
अपना अब तक का जीवन
अपने मां पापा की याद सब कुछ
एक सूटकेश में पैक कर पाना!
शायद तुम जहां ब्याही जाओ
ना बन पाए वहां तुम्हारा कोइ भी अपना
ना समझे जाए तुम्हारे दर्द
ना सुनी जाए तुम्हारी बातें
ना हो किसी को तुम्हारे होने का भी एहसास!
जबकि बदल दी जाए तुम्हारी
अपनी ही क्षवि…………….
बहू/चाची/मामी/भाभी इन तमाम नामों से!
तुम ना रह पाओ थोड़ी सी भी खुद की!
ये भी हो की थाम कर जिसका हांथ
लिया है जिसके संग अग्नि के समक्ष सात फेरे
तुमने, वो भी ना हो तुम्हारा थोड़ा सा भी!
उसके लिए शायद हो तुम मात्र बस एक शरीर!

जहां अपना सर्वस्व छोड़ कर आने के बाद भी
मिले तुम्हें दहेज में कुछ ना लाने के ताने!
जहां बांध दी जाए तुम्हारे पैरो में
दो दो घरों की मान सम्मान की बेड़ी
जहां देनी हो जाए तुम्हें अपने सम्मान,
स्वाभिमान, और सपनो की बलि।
शायद जहां तुम्हारे सहने की क्षमता से तुम्हारे
मायके के दिए संस्कारो को नापा जाए!
उस दिन तुम ब्याह करना
जिस दिन तैयार हो तुम्हारा मन,
मस्तिष्क सब इन सारी बातो पर………!

पल्लवी द्विवेदी
प्रयागराज उत्तर प्रदेश!

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