
डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है। आज की अत्याधुनिक भूख पेट की दीवारों पर नाखून से खुरचती एक जिद है। वो तीखी है मिर्च के उस टुकड़े-सी जो जीभ पर पड़ते ही आंख से आंसू निचोड़ ले, पर उसी पल स्वाद की लकीर भी खींच दे। वो खट्टी है कच्चे आम की फांक-सी, दांत खट्टे कर दे पर मन को फिर उसी के लिए ललचा दे। मीठी भी है गुड़ की डली-सी, क्षण भर को सब कड़वाहट ढक दे, पर बाद में तलब और बढ़ा दे। कुरकुरी है पत्ते पर रखे भुने चने-सी, टूटते ही आवाज़ करे, पर मुट्ठी में आए तो उंगलियों से फिसल जाए। टेंगी है इमली की चटनी-सी, होंठ सिकोड़ दे पर चाटने से रोका न जाए। क्रिस्पी है समाज की उस परत-सी जिसे हर कोई तोड़कर खाना चाहता है, पर अंदर से खोखली निकलती है।
भूख रोटी की नहीं है केवल। भूख रिश्तों की कच्ची कलियों को तोड़कर सूंघने की है, ये देखने की कि गंध आती है या नहीं। मां की हथेली में दबी रोटी की भूख अलग थी, अब इंस्टा पर लाइक की भूख है। बाप के पसीने से भीगी कमीज़ सूखने से पहले बेटे को ब्रांडेड की भूख लग जाती है। बहन राखी बांधती है तो भाई के वॉलेट की मोटाई नापती भूख जाग जाती है। प्रेमी चांद तारे तोड़ने का वादा करता है, पर असल में देह की भूख चबा जाती है सात वचनों को। दोस्ती अब मतलब की तराजू पर तुलती है, जहां यारी कम और यूज़रनेस की भूख ज़्यादा है।
सामाजिक भूख सबसे भयानक है। ये थाली में बैठकर जाति पूछती है, पानी का गिलास छूने से पहले गोत्र टटोलती है। मंदिर की सीढ़ी पर बैठा भिखारी भगवान से कम, पुजारी की दक्षिणा से ज़्यादा डरता है, क्योंकि पुजारी की भूख प्रसाद की नहीं, चढ़ावे की है। पंचायत में न्याय की भूख नहीं, दबंग की हां में हां मिलाने की भूख है। भीड़ को खून की भूख है, और मोबाइल को वीडियो की।
आर्थिक भूख ने खेत बेच दिए, नदी नीलाम कर दी, हवा तक में शेयर लगा दिए। किसान की भूख अनाज की थी, बिचौलिये की भूख कमीशन की हो गई। मजदूर की भूख दिहाड़ी की थी, ठेकेदार की भूख ठेके में बचे मार्जिन की हो गई। मौद्रिक भूख ऐसी कि नोट छापने वाली मशीन भी थक जाए, पर आदमी की तिजोरी का पेट न भरे। क्रिप्टो की भूख हवा में महल बनाती है, और ज़मीन पर आदमी भूख से मर जाता है। असली और नकली का भेद मिट गया, ब्रांड की भूख ने आंखों पर पट्टी बांध दी। नकली दूध, नकली दवा, नकली डिग्री, नकली हंसी, सब बिकता है क्योंकि खरीदने वाले की भूख असली है।
वैदिक भूख यज्ञ की समिधा मांगती थी, देवता को अर्पण के बाद प्रसाद बनती थी। आज की लौकिक भूख सिर्फ छीनना जानती है, अर्पण भूल गई। परालौकिक भूख मोक्ष की थी, अब स्वर्ग की बुकिंग भी ऑनलाइन है, वीआईपी दर्शन की भूख ने लाइन तोड़ दी। दैविक भूख श्रद्धा की थी, अब चमत्कार की भूख है, बाबा के पैर छूने से ज़्यादा उसके अकाउंट में ट्रांसफर करने की भूख है।
नैतिक भूख मर चुकी है, उसकी जगह कूटनीतिक भूख ने ले ली। सच बोलने की भूख नहीं, सच को तोड़-मरोड़कर परोसने की भूख है। राजनीतिक भूख कुर्सी की है, कुर्सी के लिए विचारधारा बदलना, गठबंधन करना, थूककर चाटना सब जायज़ है। वोट की भूख ऐसी कि मुर्दे तक जिंदा होकर अंगूठा लगा देते हैं। मनोवैज्ञानिक भूख अटेंशन की है। चार लोग सुनें, दो लोग सराहें, दस लोग जलें, बस यही खुराक है। डिप्रेशन में भी रील बनती है क्योंकि व्यूज़ की भूख दर्द से बड़ी है।
वैज्ञानिक भूख चांद पर प्लॉट काट रही है, मंगल पर पानी ढूंढ रही है, पर धरती पर प्यासे को एक लोटा पानी नहीं दे पाती। लैब में भूख के जीन पर रिसर्च चल रही है, और बाहर बच्चा कचरे में रोटी ढूंढ रहा है। एआई की भूख डेटा की है, इंसान की भूख रोटी की, और दोनों एक दूसरे को खा रहे हैं।
जमीनी हकीकत ये है कि भूख अब पेट से निकलकर आंख में, दिमाग में, मोबाइल में, संसद में, बाजार में, बिस्तर में, हर जगह बैठ गई है। कड़वी परत ये कि हम सब भूखे हैं। कोई रोटी का, कोई शोहरत का, कोई सत्ता का, कोई देह का, कोई नंबर का। और सबसे बड़ा झूठ ये कि हम तृप्त हैं।
रिश्तों की कच्ची कलियों को अब तोड़ ही दो दोस्त। क्योंकि पकने पर भी उनमें रस नहीं, सिर्फ दिखावा है। बाप-बेटे में प्रॉपर्टी की भूख, पति-पत्नी में ईगो की भूख, भाई-भाई में हिस्से की भूख, प्रेमी-प्रेमिका में पज़ेशन की भूख। चूस लो इन्हें, थूक दो छिलका, यही नवाचार है आज का।
भूख अब अन्न नहीं मांगती, आदमी को आदमी ही खा रहा है। और हम चटखारे लेकर पूछते हैं, “और कुछ लाऊं?”












