
विधा-कविता
प्रेम का प्याला पिया है मीरा ने, लाज-शर्म सब त्यागी है,
बन बैठी वो कृष्ण दीवानी, गली-गली जब डोली है।
प्रेम में राधा ने सब त्यागा, बसा लिया हृदय में मुरारी है,
प्रेम पुजारिन बनी श्याम की, कुंज-गलियों में खोई है।
प्रेम बिना यह जग सब सूना, कुछ भी न दुनियादारी है,
कभी बना हलाहल का प्याला, कभी यह अमृतवाणी है।
प्रेम बिना झूठी सब खुशियां, कोई रस न रंगदारी है,
सारा खेल तो प्रेम से उपजे, नहीं तो दामन खाली है।
कोई न प्रेम को अब तक जाना, हर कोई अज्ञानी है,
कैसा रूप-रंग और छाया, सबसे बड़ा अचंभा भारी है।
प्रेम है पावन, प्रेम ज्योति, प्रेम ही ईश्वर का अवतारी है,
प्रेममय यह हृदय हो जाए, रमे जो उसमें एक बारी है।
खोकर खुद को प्रेम जो पाया, बन गया सबसे बड़ा पुजारी है,
मिल जाता है उसको प्रभु, लग जाए लगन जो एक बारी है।
मधु गुप्ता “अपराजिता”
गाज़ियाबाद [उत्तर प्रदेश]













