
अंधेरे और उजाले, उजाले और अंधेरे
हर मनुष्य के जीवन में है पसरे।
अंधेरों के सन्नाटे से घबराया, छटपटाया
इंसान, सुकून का उजाला चाहता है।
क्या-क्या नहीं आजमाता है, क्या-क्या नहीं कहता है।
ये गरीबी,ये अशिक्षा के अंधेरे
जो अब तक उसे लपेट रहे थे, उसका दम
घोट रहे थे, उसकी राह रोक रहे थे,
इन अंधेरों से उजालों की ओर जाने के लिए
उसे स्वयं ही, स्वयं की मदद करना है।
मन के अंदर बाहर जो उजाला वो चाहता है,
शिक्षा, संस्कार और धर्म ही उसे दे सकता है।
काम, क्रोध और लोभ के व्यसनों को त्याग कर ही अंतरतम के उजाले में आंख मूंद कर जी सकता है।
सुलेखा चटर्जी













