
“ये प्रथम पुरस्कार मेने नहीं मेरी मां के मातृत्व ने जीता हैं , आज मेरी मां की ममता जीत गई , आज मेरे मां के मातृत्व ने साबित कर दिया की मैं किसी पर बोझ नहीं हूं । मैं स्वयं तो इस मंच पर नृत्य क्या खड़े होने के काबिल ना थी । ये तो मेरे मां के मातृत्व और मेरे पिता की मेहनत का नतीजा है की मेने आज ये नृत्य इस मंच पर किया।।”
ये बोल है कस्तूरी के जिसने आज राष्ट्रीय नृत्य प्रतियोगिता में भारत नाट्यम और कथक नृत्य की जो जुगलबंदी प्रस्तुत की जिसे देख सब दंग रह गए।
प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर सबको ये दिखा दिया अगर हौसला बुलंद हो तो इंसान कुछ भी कर सकता हैं।
हां मैं सही कह रही हूं ये ट्रॉफी मेरे नहीं मेरी मम्मा के हाथ में होनी चाहिए , देखिए आज भी आंखों के आंसू साड़ी के पल्लू से पोंछ रही हैं , ये मेरी मम्मा ही है फिर मंच के नीचे आकर एक साधारण दिखने वाली औरत के पैर छूती है औरत जिसने आसमानी रंग की सुपरनेट की साड़ी पहन रखी है, आंखों पर चश्मा लगा है, बालों में हल्की सफेदी ये बता रही है की उसने अपनी उम्र की जवानी को जी लिया हैं ।
कस्तूरी उसे हाथ पकड़ मंच पर ले जाती हैं और कहती हैं ये है मेरी मां , मेरी मम्मा , ।
उसका गला भर आता है क्योंकि जब भी हम अपनी मां के लिए कुछ बोलते है तो दिल से बोलते है और दिल हमेशा जज्बाती होता हैं ,इसलिए मां कहते ही हमारा गला भर आता हैं । कस्तूरी भी अपने जज्बातों को सयमित कर आगे बोलती हैं , ये साधारण सी दिखने वाली मेरी मां कभी बला की खूबसूरत हुआ करती थी , जब दुल्हन बन मेरे पापा के जीवन में आई थी तब सबने कहा था ये हुस्न का दरिया कहां से मिल गया , दुल्हन को देख कर ऐसा लग रहा है जैसे आज चांद जमीं पर उतर आया हो ।
मेरी मां सिर्फ बाहरी आकर्षण नहीं रखती थी , उनका दिल भी इतना ही खूबसूरत और मासूम था जितना की वो बाहर से दिखने में थी।
शादी के समय मेरे पापा , मेरे दोनों ताऊजी बाहर शहर में रहते थे , और मेरी मां ,मेरी दोनों ताइजी मेरे दादा , दादी के साथ गांव में ।
जब शादी के तीन साल हुए तो मेरी मां को पता चला की वो मां बनने वाली ये और सबसे पहले उन्होंने ये खबर मेरे पापा को फोन पर बताई , मेरे पापा इतने खुश हुए की अगर उनके पंख होते तो शायद उड़ कर उसी वक्त आ जाते पर ऐसा संभव नहीं था । 9 महीने में हर सात दिन के बाद मेरी मां को गुलकोज चढ़ाना पड़ता था क्योंकि उन्हें उल्टियां बहुत होती थी , एक लड़की जिसे सुई के नाम से डर लगता था वो 2 ,2 दिन तक केनुला अपने हाथ में लगाई रखती थी , और उसमें भी अपने काम खुद ही किया करती थी , क्योंकि वो चाहती थी की उसके होने वाले बच्चे को कोई कमी न हो जाए , उसको पूरा पोषण मिलना चाहिए इसलिए वो खुशी खुशी केनूला लगवा लेती थी। यही से तो एक मां का मातृत्व शुरू होता है जब बच्चा कोख में पलने लगता हैं । आखिर कार वो समय भी आ गया जब पूरे 12 घंटे प्रसूती पीड़ा को सहन कर मेरी मां ने मुझे जन्म दिया , इसमें कोई स्पेशल बात नहीं है ये हर मां करती हैं । लेकिन जन्म के 4 घंटे बाद ही मुझे dr की भाषा में बोलूं तो , मुझे सीजर अटैक आया था। जिस से मुझे 10 दिन तक dr ने अपनी नजरों में रखा। मेरी मां ने मुझे अपना दूध अपने ही हाथों से अपने स्तनों से निकाल कर पिलाया। जब मुझे मेरी मां को सोपा k। गया तब dr ने बोला था इस बच्ची की प्रोग्रेस किसी रहेगी ये में ठीक से नहीं कह सकता ।
पूरे एक साल मेरी मां ने अपना दूध अपने हाथों से निकाल कर चम्मच से मुझे पिलाया।
जब मैं 1 साल की हुई तब मेरी मां को पता चला की मैं और बच्चों जैसी नहीं हूं , मेरे जन्म के समय आया सीजर अटैक मेरे मानसिक और शारीरिक विकलांगता का कारण बना ।
मेरी मां बहुत रोई की क्यों उसकी बच्ची को ऐसा बनाया , तब मेरी दादी ने कहा ,” बहु ऐसे बच्चे तो अपने मां बाप से बदला पूरा करने आते हैं , ये तो कोई पहले के जन्म के कर्मों का फल हैं , ऐसे बच्चे सिर्फ मां बाप पर बोझ होते हैं तू इसकी चिंता न कर दूसरा बच्चा कर ले”।
ये सुन मेरी मां के मातृत्व भाव को बहुत ठेस पहुंची मुझे नहीं पता की मेरी मां उस वक्त चुप कैसे रह गई , इन्होंने दादी से तो कुछ नहीं कहा पर उसी वक्त मेरे पापा को फोन कर सारी बात बताई और बोला मेरी बच्ची किसी पर भी बोझ नहीं हैं , मैं अपनी बच्ची को किसी पर भी बोझ बनने ही नहीं दूंगी ।
मेरे पापा ने मेरी मां का पूरा साथ दिया और दूसरे ही दिन वो मां और मुझे लेने गांव चले आए ।
जब मेरे दादा ने उन्हें अचानक आने का कर पूछा तो उन्होंने कहा, ” मैं अपनी बच्ची का इलाज शहर में किसी अच्छे डॉक्टर से करवाना चाहता हूं , इसलिए अपनी बच्ची और अपनी पत्नी को शहर ले जाने आया हूं “।
ये सुन मेरे दादा जी आवेश में आ गए और उन्होंने बहुत खरी खोटी सुनाई की क्या हम तुम्हारी बच्ची का इलाज नहीं करवा रहे और भी बहुत कुछ फिर भी पापा अपनी बात पर कायम रहे और मुझे मां के साथ शहर ले आए।
शहरी डॉक्टर ने मेरा चेकअप कर बोला की देखिए mr. आपकी बेटी का इलाज हो तो सकता है क्योंकि ये अभी बहुत छोटी है , और अभी इसकी ग्रोथ करने की उम्र भी बाकी हैं लेकिन….
तभी मेरी मां बोली लेकिन ,लेकिन क्या सर ?
डॉक्टर: लेकिन इसमें पैसा और समय बहुत खर्च होगा ।
पापा बोले पैसों की आप चिंता न करे अपनी बच्ची के लिए में खूब मेहनत करूंगा पर इसके इलाज में कोई कमी नहीं रखूंगा।
मेरी मां ने कहां आप जैसे बोलोगे मैं वैसा ही करूंगी सर ।
डॉक्टर: तो फिर मेम आप ये भूल जाए की आप की अपनी कोई जिंदगी हैं अगर आप अपनी बच्ची को एक सुनहरा और सुखद भविष्य देना चाहती हैं तो भूल जाए की आपकी जिंदगी हैं ।
मां बोली इसके लिए में कुछ भी करूंगी मैं भूल जाऊंगी की मेरा भी कोई जीवन हैं ।
उस दिन से मां ने अपना पूरा समय मेरी एक्सरसाइज , मेरी इस्पिच थेरिपी , और भी ना जाने क्या क्या सब समय पर मुझे करवाती , चाहे कोई त्यौहार होता, या परिवार में कोई शादी मेरी मां कभी किसी भी परिस्थिति में मेरी एक्सरसाइज , इस्पीच थारीपी , फिजियोथेरेपी में कमी नहीं रखी । चार चार दिन तक मेरी मां बाल भी नहीं बनाती थी पर मेरे काम में कोई कमी नहीं रखती थी । घर का काम मेरे पापा के काम और फिर मुझे एक क्लिनिक से दूसरे क्लिनिक ले जाना मेरी मां पूरी मशीन बन गई एक ऐसी मशीन जो कभी थकती ही नहीं थी ।
7 साल के बाद मेरी मां ने मेरे मुंह से मां शब्द सुना पर जब मेने ये शब्द बोला उसी वक्त मेरे पापा की मौत का समाचार मेरी मां के पास पहुंचा , पर आज फिर एक मां जीत गई और एक पत्नी हार गई मेरे मुंह से मां सुनकर अपने दुख को मुझ से छुपाकर मेरी मां ने मुस्कुरा कर मुझे गले लगा लिया ।
कितना मुश्किल था न एक पत्नी के लिए अपने पति की मौत पर मुस्कुराना, पर एक मां के लिए नहीं था इतना मुश्किल।
मेरी मां के मातृत्व ने हर परीक्षा को पार कर न ही मुझे मेरे पैरो पर चलना सिखाया बल्कि इस काबिल बनाया की आज मेरे हाथ में ये ट्रॉफी हैं ।
और ट्रॉफी अपनी मां के हाथों में थमाकर बोलती हैं आप महान हो मम्मा मेरे लिए मेरा पूरा संसार हो।
कस्तूरी की मां उसे अपने गले से लगा अपने आंचल में छुपा लेती हैं । ये एक मां का मातृत्व है की उसे अपने आंचल में छुपा लेता हैं।
जय माता जी की
विद्या बाहेती राजस्थान













