
यह कपटी धोखेबाज जमाना,
तुम भी बचकर सदा ही रहना।
गिरने वाले को ओर गिराते हैं,
एक दूजे के नहीं सुख सहते हैं,
जाने सब लोग सबकों हराना।
सब चेहरे पर मुखौटा लगातें है,
अपनों को नहीं पहचान पाते हैं,
जहां में करते सब लोग बहाना।
पग-पग पर यहां जमाना बेदर्दी,
सपना रह गई जमाने में हमदर्दी,
बात करते एक दूजे को जलाना।
कहें आगे सबके कुछ पीछे कुछ,
जग में कहां रही अब सबके मुंछ,
नामर्द के पीछे समय मत गंवाना।
अपनों के पीछे चलते सब चाल,
कहां पूछते सब अपनों का हाल,
अपनों के बीच सब बनें सयाना।
स्वरचित और मौलिक कविता
सर्वाधिकार सुरक्षित
सुनील कुमार “खुराना”
नकुड़ सहारनपुर
उत्तर प्रदेश भारत













