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गीत सृजन


मुखड़ा-
पहाड़ों से फिर आवाज़ आई है,
सूरज ने फिर से आग लगाई है।।

मैं हूँ वही अटल, अडिग सा पर्वत,
जिसने हर युग की कथा सुनाई है।
काट-काट कर तन को घायल किया-
मानव ने कैसी रीत निभाई है।
रोता पर्वत सुना ये दुहाई है।

पहाड़ों से फिर आवाज़ आई है।
सूरज ने फिर से आग लगाई है।।

वन थे मेरे हरियाले आँचल में,
पंछी ने मधुर तान सुनाई है।
अब सूने हैं आँगन मेरे सारे,
पीड़ा मन की उसने बताई है।।
रोता पर्वत सुना ये दुहाई है।

पहाड़ों से फिर आवाज़ आई है।
सूरज ने फिर से आग लगाई है।।

नदियाँ मेरी गोद में पलती थीं,
जीवन की सुधा धारा बहाई है।
खनन की चोटों से फटता सीना,
धरती भी संग-संग भरमाई है।
रोता पर्वत सुना ये दुहाई है।

पहाड़ों से फिर आवाज़ आई है।
सूरज ने फिर से आग लगाई है।।

सूरज की तपिश अब चुभती मुझको,
हरियाली जब से दूर भगाई है।
जलते तन से धुआँ उठ रहा देखो,
प्रकृति ने कैसी सज़ा दिलाई है।
रोता पर्वत सुना ये दुहाई है।

पहाड़ों से फिर आवाज़ आई है।
सूरज ने फिर से आग लगाई है।।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा’सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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