Uncategorized
Trending

जेठ की गर्मी: दुपहरी का लू

आया जेठ का महीना,
आग बरसाता सूरज,
धरती तवे-सी तप रही,
साँसें भी हैं अब बोझ।
दुपहरी होते गलियाँ
सब सन्नाटे में डूबें,
छाया भी माँगे छाया,
पेड़ों की जड़ें भी सूखें।

लू के झोंके चलें ऐसे,
जैसे तंदूर की हो भट्ठी,
पसीना मोती बन गिरे,
कंठ में काँटे सी चुभती।
कोयल भी चुप हो गई,
पीपल तले नही कोई है,
पानी की एक बूँद को,
पंछी सभी तरसें सोई है।

नदी की रेत दरक रही,
ताल-तलैया सब सूखे,
बैल भी खड़े हैं बुझकर,
किसान के माथे हैं रुखे।
अमवा की डालें झुकी है,
पर पका न पाए फल,
धूप की मार से कुम्हलाए,
घर-आँगन के हर पल।

छप्पर से लू टपक रही,
मिट्टी फटकर रोती,
घड़े का पानी भी उबले,
मटके से भाप उठती।
बच्चे माँ की गोद माँगें,
बूढ़े सब पंखा झलते,
शाम ढले तब चैन मिले,
जब बादल काले दिखते।

पर जेठ सिखाता भी है, सहनशीलता का पाठ,
तपकर ही सोना कुंदन,
तपकर ही मज़बूत घाट।
जो झेल गया जेठ की आग,
सावन उसको अति भाए,
हर तपन के बाद मित्रों
सावन की बूँदें बरखा लाए।

आदित्य हौसला रखें,
धूप कितनी भी हो तेज़,
घड़ा भर जल पीते चलें
गमछा, टोपी रखिये सेज़।
जेठ गुज़र जाएगा,
फिर हरियाली छाएगी,
तपी धरा पर बूँद गिरे,
तब ठंडक लहराएगी।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *