
सब सो रहे हैं चैन की नींद में यहाँ,
मेरे दर्द को सहलाने को जागेगा कौन।
लुटता रहा, छटपटाता रहा ज़िंदगी भर मैं,
मेरे दुखते हुए मन पर मरहम लगाएगा कौन।
भीड़ में रहा मगर अपना कोई मिला नहीं,
मेरे दिल की बात आखिर सुनेगा कौन।
उम्र भर दीप बनकर जलता रहा हूं मैं,
मेरे बुझते हुए दीप को फिर जलाएगा कौन।
जब तक साँस है, सबको अपना कहता रहा हूं,
इस भरी भीड़ में भी मुझे अपना कहेगा कौन।
सूख गई हैं आँखें मेरी इंतज़ार करते-करते,
मेरी राहों में प्रेम का दीप जलाएगा कौन।
रोते-बिलखते बीत गई उम्र सारी मेरी,
आख़िरी वक़्त में मुझको हँसाएगा कौन।
जीवन भर घाव मिले, कोई हमदर्द नहीं मिला,
मेरे टूटे हुए दिल को फिर बहलाएगा कौन।
जब साँसों की डोरी भी टूट जाएगी एक दिन,
मेरी याद में दो आँसू बहाएगा कौन।
गल गई मांस-मज्जा, क्षीण हुआ यह तन,
बची हुई अस्थियों को आखिर जलाएगा कौन।
नाम मेरा भी समय की धूल में खो जाएगा,
बीते किस्सों को मेरा फिर दोहराएगा कौन।
चला जाऊँगा एक दिन ख़ामोशी ओढ़कर,
मेरी अधूरी ग़ज़ल को आगे गाएगा कौन।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड













