
मौसम तो हर साल बदलता है,
पर कुछ मौसम मन में ठहर जाते हैं,
कुछ बारिश बनकर आँखों से बहते हैं,
कुछ धूप बनकर यादों में उतर जाते हैं।
कभी सर्द हवाएँ छूकर जाती हैं,
तो बीते लम्हों की सिहरन जगा देती हैं,
कभी बसंत की कोमल आहट,
सूखे मन में उम्मीदों के फूल खिला देती है।
बरसात की पहली बूंद जब धरती को चूमती है,
मन की बंजर राहों पर भी हरियाली झूमती है ,
भीगी मिट्टी की खुशबू में,
कितनी पुरानी यादें फिर से महक उठती हैं।
गर्मियों की तपती दोपहरी भी,
जीवन का एक सच बताती है,
संघर्ष की अग्नि में तपकर ही,
हर आत्मा अपनी चमक पाती है।
पतझड़ जब पत्तों को बिखेर देता है,
तब लगता है सब कुछ खो गया,
पर वही वृक्ष कुछ समय बाद,
नई कोंपलों से फिर भर जाता है।
शायद मौसम हमें यही सिखाते हैं,
कि ठहराव कभी स्थायी नहीं होता,
हर दुःख के बाद एक बसंत आता है,
और हर अँधेरा सदा नहीं होता।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













