
खामोश हूँ तो इसका मतलब ये नहीं,
की मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं।
कुछ जख्म ऐसे भी होते हैँ,
जो शब्दो में बया नहीं होते।
लोग चेहरा देखकर हाल पूछते हैँ,
दिल की हालत कोई नहीं पढता।
हम भी कभी बेफिक्र हंसा करते थे,
अब मुस्कुराने की वजह ढूंढते है।
वक्त ने बहुत कुछ सिखाया हैँ,
अपनों का असली चेहरा दिखाया हैँ।
अब हर किसी पर भरोसा नहीं करते,
क्योंकि दिल ने धोखे बहुत खाए हैँ।
फिर भी उम्मीद जिन्दा है दिल में,
एक दिन सब अच्छा होगा।
सपने जो देखे थे खुली आँखों से,
वो नींदों में भी अब आते नहीं।
अपनों ने ही जब ठोकरें मारीं,
तो गैरों से गिले-शिकवे जाते नहीं।
मजबूत दिखने का नाटक करते हैं,
अंदर से रोज़ मरा करते हैं।
जिनको अपना समझा था हमने,
वो ही पीठ में खंजर धरा करते हैं।
रात भर करवटें बदलते हैं,
दिन में सबके सामने लड़ते हैं।
किसी को क्या बताएँ हाल अपना,
लोग तमाशा समझकर पढ़ते हैं।
आँखों में समंदर लिए फिरते हैं,
लबों पर झूठी हँसी धरे फिरते हैं।
जो पूछे “कैसे हो” रस्मन,
उससे “सब ठीक है” कहे फिरते हैं।
पर टूटा हुआ तारा भी चमकता है,
गिरकर भी आसमाँ में सजता है।
मैं भी बिखर कर संभल जाऊँगा,
ये यकीन अब भी दिल में पलता है।
“अमन” कहे ये दौर भी गुज़र जाएगा,
हर रात के बाद सहर आएगा।
जिन ज़ख्मों को लफ्ज़ ना मिले,
वक़्त उनको खुद भर जाएगा।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













