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गंगा एक ऐसी फिर से निकलनी चाहिए

बहुत धोती रही है गंगा अबतक,
पापियों के पापों को,

नष्ट करती रही है सबके,
श्राप ताप संतापों को,

अब पापी को ही बहा कर ले जाए।
गंगा एक ऐसी फिर से निकलनी चाहिए।।

जेलों में होते कैद,
निकल बाहर चले आते,

न कोर्ट कचहरी का चक्कर,
न हो किसी वकील का टक्कर,

जला दे हर उस अपराधी को,
हर सीने से आग अब ऐसी निकलनी चाहिए।

अब पापी को ही बहा कर ले जाए,
गंगा एक ऐसी फिर से निकलनी चाहिए।।

जिसे करना था आबाद,
बर्बाद उसी ने कर डाला,

नायकों ने ही देश को,
नरक बना कर रख डाला,

बहुत उठा चुके सर अपने,
अब इनकी सर कुचलनी चाहिए।

अब पापी को ही बहा कर ले जाए,
गंगा एक ऐसी फिर से निकलनी चाहिए।।

मर्जी चलती कुर्सी वालों की,
जमीं वालों की तो खैर नहीं,

रटते रहते हिंदू मुस्लिम,
आपस में इनकी बैर नहीं,

भ्रमित रही है जनता इनसे,
अब इनकी शामत आनी चाहिए।

अब पापी को ही बहा कर ले जाए,
गंगा एक ऐसी फिर से निकलनी चाहिए।।

जनता हो चुकी है निरीह,
कभी तो आयेगा कोई मसीह,

किसे बैठाएं किसे उतारे,
फिक्र में रहती सारी डीह,

असुरक्षित हो रहे बेटे बेटियां,
सेंक रहे ये अपनी रोटियां,

फिर से फुलन देवी का,
पुनर्जन्म होनी चाहिए।

अब पापी को ही बहा कर ले जाए,
गंगा एक ऐसी फिर से निकलनी चाहिए।।

रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड

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