
मैं पथिक हूँ, बढ़ रहा हूँ
उन्नति की तलाश में,
क्या पता किस मोड़ पर
मंज़िल से मुलाक़ात होगी।
पीछे छोड़ आया हूँ
बहुत-सी कल्पनाओं को,
बहुत-सी यादों और विफलताओं को,
जिन्हें शायद कभी पूरी तरह भूल न पाऊँ।
भविष्य का तो पता नहीं,
पर भूत और वर्तमान की स्मृतियाँ
हर पल मुझे रुलाती हैं।
आँखों से नहीं, दिल से रोता हूँ मैं,
दिल में आँसुओं का एक अथाह सैलाब है,
जो शायद कभी सूख न पाए।
चिकित्सक ने कहा था—
“आपकी आँखों का पानी सूख गया है।”
उसे क्या मालूम,
आंखें तो सिर्फ माध्यम है,
आँसू तो दिल के सागर से निकलकर
आँखों के रास्ते बहते हैं।
चेहरे पर मुस्कान की एक छावनी है,
जो सब कुछ छिपाए रखती है,
क्योंकि दिल पर किसकी नज़र जाती है?
जो मेरे दिल को देख सकेगा,
वही मुझे पढ़ सकेगा,
मेरी अनकही कथाओं को सुन सकेगा।
जो मेरी खामोशी का अर्थ समझ लेगा,
वही मेरे दर्द का इतिहास जान सकेगा।
वरना दुनिया तो चेहरे पढ़ती है,
दिलों की किताब कौन खोल सकेगा।
कौन मेरी आँखों में झाँकेगा,
हर लहर में एक अधूरी कहानी होगी,
हर गहराई में कोई खोया सपना मिलेगा।
मैंने दर्द को अपना हमसफ़र बना लिया है,
वह बिना बुलाए साथ चलता है,
खुशियाँ तो राह में मिलकर बिछड़ जाती हैं,
पर दर्द हर मोड़ पर मेरा हाथ थाम लेता है।
लोग पूछते हैं—”इतना मुस्कुराते क्यों हो?”
मैं क्या बताऊँ उन्हें,
मुस्कान तो एक परदा है,
जो भीतर के तूफ़ानों को छुपाए रखता है।
कई बार चाहा कि दिल खोलकर रो लूँ,
पर आँसुओं ने भी शिष्टाचार सीख लिया है,
अब वे भीड़ में नहीं बहते,
बस तन्हाई में चुपचाप उतर आते हैं।
फिर भी मैं पथिक हूँ, रुकूँगा नहीं,
चाहे कितनी ही लंबी यह रात हो,
मुझे विश्वास है कि किसी सुबह
मेरे हिस्से का भी सूरज उगेगा।
और जिस दिन कोई मुझे सचमुच पढ़ लेगा,
मेरे शब्दों के पीछे छिपी वेदना समझ लेगा,
उस दिन शायद दिल का यह सैलाब थम जाए,
और मेरी आत्मा को एक किनारा मिल जाए…….
रवि भूषण वर्मा













