
ये रंग बदलते रिश्ते भी, कितने अजीब तमाशे हैं,
चेहरों पर मुस्कान सजी, भीतर कितने निराशे हैं।
कल तक जो अपने लगते थे, हर दुःख में साथ निभाते थे,
वक्त की धूप जरा क्या बदली, वो राह नई अपनाते हैं।
स्वार्थ की चादर ओढ़े हुए, संवेदनाएँ सो जाती हैं,
मतलब की आँधी चलते ही, पहचानें भी खो जाती हैं।
जो हाथ कभी थामे थे, वो हाथ छुड़ाकर चलते हैं,
आँसू की भाषा भूल सभी, शब्दों से दिल को छलते हैं।
रिश्तों की इस रंगशाला में, हर रंग नया दिख जाता है,
सच्चाई का उजला दर्पण, अक्सर ही धुंधला जाता है।
फिर भी मन उम्मीद रखे, कुछ रिश्ते अब भी सच्चे हैं,
जो सुख-दुख दोनों में साथ रहें, वे ही जीवन के अच्छे हैं।
रंग बदलते इस जग में भी, विश्वास का दीप जलाए रखना,
जो दिल से अपना हो जाए, उसे सदा हृदय से लगाए रखना।॥
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













