
प्रेम के पेच सिखा कर प्रिय पहुंच से दूर हो गए।
क्या थी शिकवा शिकायत सो सनम मजबूर हो गए।।
बैठ बात करते बतियाते कुछ तो भी हल निकलता,
यूं लगता मनहर निज रूप लावण्य पर मगरूर हो गए।।
मनोहर मधुकर

प्रेम के पेच सिखा कर प्रिय पहुंच से दूर हो गए।
क्या थी शिकवा शिकायत सो सनम मजबूर हो गए।।
बैठ बात करते बतियाते कुछ तो भी हल निकलता,
यूं लगता मनहर निज रूप लावण्य पर मगरूर हो गए।।
मनोहर मधुकर
नवल बिहान साहित्य कला संस्कृति मंच की आभासी गोष्ठी
हिंदी राष्ट्र भाषा सम्मान — मौलिक कविता
गुरु गौरव सम्मान 2026
वृद्ध—बोझ नहीं, अनुभव की धरोहर
मुझे ऐसा लगा कि यह मेरे लिए है,
आसमान को जलने दो
आज ही जिंदगी है,
भारत विकास परिषद् मुख्य शाखा इटावा ने संस्कृति सप्ताह के अन्तर्गत आयोजित की अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता
अब आगे भी कुछ मत कहना,
पत्थरों की दुनियाँ