
अब आगे भी कुछ मत कहना,
खामोशी को पलने दो।
जिसको जो दिखता है जग में,
उसको वैसा ही रहने दो।
न्याय अगर थक जाए राहों में,
अन्याय को चलने दो।
जिन आँखों में सपने बाकी हैं,
उन सपनों को जलने दो।
भूख अगर आवाज़ उठाए,
उस आवाज़ को दबने दो।
महलों में दीपक जलते रहें,
झोपड़ियों को ढलने दो।
नफ़रत की दीवारें ऊँची हों,
रिश्तों को थोड़ा गलने दो।
दिल में अगर प्यार बचा हो,
उस प्यार को फिर पलने दो।
कलम अगर सच लिखने बैठे,
उसको थोड़ा डरने दो।
शब्द अगर बगावत बन जाएँ,
कागज़ को भी जलने दो।
फिर भी कोई बच्चा पूछे—
“क्यों दुनिया ऐसी है?”
उसके मासूम सवालों को
कुछ पल यूँ ही टलने दो।
शायद किसी सुबह के सूरज को
फिर से सच में उगना होगा,
आज अँधेरा जितना चाहे,
आज अँधेरे को ढलने दो।
आसमान को जलने दो,
सूरज को झुलसने दो।
एक दिन इंसानियत जीतेगी,
आज आदमी को लड़ने दो।
आसमान को जलने दो,
धरती को कुछ कहने दो।
जब तक साँस बची है सीने में,
उम्मीद को भी रहने दो।
आर. एस. लॉस्टोम












