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मगरुर

प्रेम के पेच सिखा कर प्रिय पहुंच से दूर हो गए।
क्या थी शिकवा शिकायत सो सनम मजबूर हो गए।।
बैठ बात करते बतियाते कुछ तो भी हल निकलता,
यूं लगता मनहर निज रूप लावण्य पर मगरूर हो गए।।

मनोहर मधुकर

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