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माँ की सिलवटें – एक उम्र का हिसाब

माँ के आँचल में जो सिक्के बंधे मिलते थे,
वो सिक्के नहीं थे, उसकी दुआएँ थीं।
हम समझते थे गरीबी है घर में,
पर वो तो बस उसकी खुद्दारी की परछाईयाँ थीं।

उसकी साड़ी में जितने पैबंद लगे थे,
उतनी बार उसने हमारी ज़िदें सी दी थीं।
थाली में रोटी कम पड़ जाती थी अक्सर,
पर माँ कहती थी – “बेटा, मेरा पेट भरा है, तू खा ले।”

स्कूल की फीस के लिए उसने कंगन बेचे थे,
पर हमारे हाथों में कभी कमी नहीं आने दी।
हम दोस्तों में शेखी बघारते थे नए जूतों की,
वो नंगे पाँव मेले में हमारे पीछे दौड़ती थी।

उसके हाथों की लकीरों को पढ़ा करो,
वहाँ रामायण, गीता, कुरान सब लिखा है।
हम बड़े होकर दुनियादारी सीख गए,
वो आज भी बस ममता की ज़ुबान समझती है।

बाबूजी जब दुनिया छोड़ गए,
मोहल्ले ने कहा अब ये घर कैसे चलेगा?
माँ ने चूल्हा भी फूँका और हमारा भविष्य भी,
कभी आँख में आँसू नहीं आने दिया।
रात को जब हम सो जाते थे,
वो जागकर हमारी फटी किताबें सिलती थी,
जैसे टूटे हुए सपनों को जोड़ रही हो।

आज एसी वाले कमरे में नींद नहीं आती,
माँ की गोद वाली लोरी बहुत याद आती है।
दौलत के अंबार लगा दिए हमने,
पर माँ की सिलवटों वाला वो तकिया नहीं कमा पाए।

वीडियो कॉल पर चेहरा भर देख लेती है,
और कह देती है – “बेटा कमज़ोर लग रहा है।”
हम हज़ारों मील दूर भी झूठ नहीं बोल पाते,
माँ की नज़र शहरों की दूरी नहीं देखती।
हम कहते हैं माँ, अब तो सब है अपने पास,
वो कहती है – “पर तू नहीं है ना बेटा।”

उसके फोन की बैटरी अब जल्दी खत्म होती है,
पर हमारे इंतज़ार की बैटरी कभी नहीं।
शाम को दरवाज़े पर कान लगाए बैठी रहती है,
कि शायद डाकिया हमारे खत ले आए,
उसे क्या पता कि अब खत नहीं, वॉट्सऐप का ज़माना है।

जिनके सिर पर माँ का साया है,
वो दुनिया के सबसे अमीर लोग हैं।
और जिनकी माँ नहीं, उनके पास,
सब कुछ होकर भी कुछ नहीं है।
क्योंकि माँ के बिना त्योहार,
सिर्फ़ कैलेंडर की तारीख हैं।

तो जाओ, आज माँ के पैर छू आओ,
कल किसने देखा है।
माँ की उम्र, बेटे का घमंड,
और वक्त का पहिया,
तीनों किसी के लिए रुकते नहीं।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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