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जाति का ज़हर

जाति का ज़हर नफ़रत बोता,
इंसानों को इंसानों से तोड़ता।
जो धरती सबकी माँ कहलाती,
उसी पर दीवारें खड़ी कर जाता।

न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबमें एक ही साँस का नाता।
खून का रंग सभी का एक है,
फिर कैसा यह झूठा बँटवारा?

मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजे,
सब प्रेम का ही पाठ पढ़ाते।
फिर क्यों कुछ मन अँधेरे होकर,
जाति के नाम पर आग लगाते?

जिसने कर्म को धर्म बनाया,
वही सच्चा इंसान कहलाया।
जाति नहीं, चरित्र की ऊँचाई,
जीवन का असली मान बताया।

आओ मिलकर प्रण यह लें,
मन से हर भेदभाव मिटाएँ।
प्रेम, समानता और मानवता का,
हर दिल में दीप जलाएँ।

याद रखो—
जाति का ज़हर समाज को बाँटता है,
प्रेम का अमृत राष्ट्र को जोड़ता है।
इंसान की पहचान उसकी जाति नहीं,
उसके विचार, उसका चरित्र और उसके कर्म हैं।

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