
कलयुग के इस कालखंड में मतलब का है जोर
जबतक मतलब सिद्ध तबतक सबआपकी ओर
मैं भी कौन सा दूध का धुला हूं खडा हूं एक छोर
जैसी बाजे बांसुरी सब नाचेंगे मचा मचा के शोर
नही डरता किसी पाप से पकडे कुकर्म की डोर
सेंध लगा लेता भगवान घर तोड सब द्वार- मोर
राहु काल प्रबल है छिपा सज्जन भेष दुर्जन है
जिसका आगे पीछे कोई नही वो भी पाप लिप्त है
अच्छी शिक्षा दीक्षा का कोई मतलब नही शेष है
स्वार्थ भरी इस दुनिया में लालच लालसा हीश्रेष्ठ है।
-गोवर्धन थपलियाल













