
महावीर के लघुनंदन उत्तम करूणा के धारी हैं,
जीवों का रक्षण करते मुनिवर ये परम उपकारी हैं,
छोटे छोटे प्राणी को सहला के दूर हटा देती,
शब्दों में ना वर्णी जाए पिच्छी की महिमा न्यारी है !!
धन्य धन्य है पिच्छी जो गुरूवर के हाथ में रहती है,
संयम की निर्मल सरिता बन जिन मुद्रा से बहती है,
मूलगुणों को पालने में गुरूवर का साथ निभाती है,
मृदुता हो ऐसी जीवन में पिच्छिका ये दर्शाती है…!!!
मृदुल स्पर्श, लघु भार लिए, निष्काम अहिंसा का श्रृंगार,
जीव-दया की ज्योति जगा, हर प्राणी का रखता सत्कार।शुचिता, पावन भाव समेटे, धर्म-पथ का बने आधार,
मोर-पंख पिच्छिका कहे, करुणा ही जीवन का सार।
केवल पंखों का गुच्छा नहीं, यह करुणा की भाषा है,
सूक्ष्म जीव की रक्षा करना जिसकी प्रथम अभिलाषा है,
निर्ग्रन्थ मुनि के कर में शोभित पावन धर्म-ध्वजा सी यह,
जीव-दया का दीप जलाती पिच्छी धर्म-प्रकाशा है॥
पिच्छी दे संदेश कि कैसा मानव का व्यवहार रहे,
नेत्रों को छू जाए भी तो कभी ना उनकी पीर बढ़े,
कोमल वाणी, काया औ भावों की प्रतीक है पिच्छी
मनसा वाचा काया से ना किसी जीव को कष्ट पड़े !!
देख इसे मन में अहिंसा का निर्मल भाव उमड़ता है,
ममता, करुणा और मैत्री का पावन निर्झर झरता है,
देती मौन मयूर पिच्छिका चर्या से उपदेश सदा,
सब जीवों में आत्मा एक सी, धर्म सार यह कहता है!
अहिंसा की अमर साधना का यह दृढ़ आधार बने,
संयम, शील, तप और दया का जग में शुभ विस्तार बने,
पंचमहाव्रत की महिमा का यह अनुपम उद्घोष करे,
मयूर पिच्छिका को देख मन अहिंसा का द्वार बने॥
ऋतु परिवर्तन पर मयूर जब अपने पंख गिराता है,
प्राकृतिक यह सहज विधान नव श्रृंगार सजाता है,
पीड़ा देकर नहीं किसी को इसका निर्माण किया जाता,
दिगम्बर मुनियों की प्रकृति पर निर्भरता दर्शाता है!
लेश मात्र नहीं वेदना दी जाती, लेने में मोर के पंख,
वन उपवन में स्वत: गिराए जाते हैं ये मोर के पंख,
पंच गुणों के कारण यह सहयोगी बनते साधना में,
निर्ग्रन्थ मुनि उपकरण रुप में हाथ में रखते मोर के पंख !!
किसी जीव का शोषण और ना किसी प्राणी का भक्षण हो,
अहिंसा के माध्यम से, अहिंसा का पालन संरक्षण हो,
तीर्थंकरों ने मयूर पिच्छिका की बताई परिपाटी है,
निर्दोष चर्या पे अनर्गल आरोपों का वैज्ञानिक खंडन हो!
करुणा, दया, अहिंसा का यह अनुपम उपकरण है,
जिनशासन की गौरव-गरिमा का पावन आभरण है।
सूक्ष्म जीवों की रक्षा में “माहिर” जिसका हर कण कण,
मयूर पिच्छिका साधुता का जीवंत दिव्य उदाहरण है॥
विरेन्द्र जैन “माहिर”
नागपुर महाराष्ट्र













