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आग लगा देता था पानी में”

कुछ गलतियाँ हुई हैं मुझसे नादानी में,
मैं बुरा हूँ, कुछ लोगों की कहानी में।

बचपन तो, राजकुमार सा बिता मेरा,
शायद इसलिए फ़कीर हूँ जवानी में।

ये तो नसीब की मार है बुझा-बुझा सा हूँ,
वरना मैं, आग लगा देता था पानी में।

इश्क़ किया था मैंने भी, शिद्दत-ए-ईमानी में,
पर वो इबादत लिख दी गई गुनाह की कहानी में।

माँगने वाला हाथ कभी फैलाया नहीं था मैंने,
पर वक़्त ने भिखारी बना दिया मेरी रवानी में।

लोग कहते हैं चेहरा पढ़ लेता हूँ मैं सबका,
पर अपना अक्स ही नहीं दिखा मेरी पेशानी में।

दोस्तों की महफ़िल में अब जाता नहीं हूँ,
क्योंकि ज़िक्र मेरा होता है उनकी मेहरबानी में।

उठा लेता था जो तूफ़ान अपनी उँगली के इशारे से,
वो शख़्स अब डरता है अपनी ही परछाई में।

सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक अधिकार एवं अप्रकाशित रचना

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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