
पुराने दिन कितने अच्छे थे, कितना सच्चा प्यार था,
हर चेहरे पर अपनापन था, हर रिश्ता उपहार था।
सुख-दुख में सब साथ खड़े थे, मन में कोई भेद न था,
छोटा-सा घर ही सही मगर, खुशियों से भरपूर था॥
माँ के हाथों की रोटी में, ममता का स्वाद समाया था,
दादी-नानी की कहानियों ने, बचपन खूब सजाया था।
शाम ढले जब सब मिल बैठते, हँसी-खुशी के मेले थे,
रिश्तों की उस गर्माहट के, सचमुच रंग निराले थे॥
आज समय तो आगे बढ़ा है, सुविधाओं का दौर आया,
मोबाइल और इंटरनेट ने, दुनिया को घर तक पहुँचाया।
पर इस भागती-दौड़ती दुनिया में, अपनापन खो गया,
रिश्तों का वह मीठा बंधन,अब धीरे-धीरे दूर हो गया॥
आज बड़े-बड़े घर हैं लेकिन, मन का आँगन सूना है,
भीड़ बहुत है चारों ओर, फिर भी हर इंसान अकेला है।
बातें होती हैं फोन पर, मिलना-जुलना बहुत कम होता है,
दिल की बात समझने वाला, कोई बिरला ही अब होता है॥
आओ फिर से याद करें हम, उन बीते सुनहरे दिनों को,
प्रेम, दया और अपनापन दें, अपने सभी संबंधों को।
बीते कल की वह मीठी यादें, आज भी मन को भाती हैं,
स्नेह, सद्भाव और मानवता की, सच्ची राह दिखाती हैं॥
योगेश गहतोड़ी “यश” (ज्योतिषाचार्य / साहित्यकार)
नई दिल्ली – 110059








