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बेघर

अचरज है यहाँ जिनका कोई घर है न द्वार है,
वो पूछते फिरते हैं अभी कितनी दूरी पार है।

ठिकाना उन्हें भगवान भी न बता सके,
वो लोग भी कहते हैं कि तेरा साथी यार है।

रोटी के लिए बेच दिया जिसने अपना मान भी,
दुनिया उसे कहती है बड़ा नामदार है।

काग़ज़ की नाव लेकर सागर से लड़ते हैं,
और पूछते हैं लहर से कितना बवंडर है।

हम जिनके लिए जान को दांव पर लगा बैठे,
वो कहते हैं उपकार का कुछ और असर है।

जिस थाली में छेद हैं उसी से दान बाँटते,
और पूछते हैं भूख की कितनी मार है।

पाँव में छाले लिए जो युगों से खड़े हैं,
उनसे पूछते हैं अब कितनी डगर बाक़ी है।

जिनके होठों पर युगों से ताले जड़े हैं,
उनसे ही कहते हैं बोलो क्या समाचार है।

हमने जो शीशे के घर पर पत्थर नहीं फेंके,
वो कहते हैं तेरे हाथ में क्यूँ ये पत्थर है।

अब किससे करें शिकायत इस ज़माने की,
हर कोई यहाँ ख़ुद से ही बेख़बर है।

सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक अधिकार एवं अप्रकाशित रचना

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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