
चन्द्रनखा के नाम से,लंका में विख्यात।
राजा रावण की बहन,निशाचरी कुख्यात।।
पितृ विश्रवा माँ कैकसी,राक्षस वंश कुलीन।
रूप बहुत विकराल था,अंतस बहुत मलीन।।
करज सूप से भी बड़े,भारी भरकम पेट।
भोले-भाले जीव का,करती थी आखेट।।
तेज नुकीले दांत थे,सूरत बहुत कुरूप।
टेढ़ी-मेढ़ी नाक थी, जैसे हो नलकूप।।
करती थी शूर्पणखा ,विद्युतजिव्हा से प्यार।
किन्तु दशानन को नहीं, रिश्ता था स्वीकार।।
चुपके से पर कर लिया,दानव संग विवाह।
सुनकर रावण को हुआ,मन में क्रोध अथाह।।
रावण ने कर आक्रमण,डाला पति को मार।
छोड़ शूर्पणखा दिया, सुनकर करुण पुकार।।
रावण के आदेश पर,लंका का कर त्याग।
कानन में रहने लगी, छोड़ सभी खटराग।।
बात भ्रात की मानकर,खर दूषण के संग।
कानन में रहने लगी, छोड़ राजसी ढंग।।
एक दिवस करते भ्रमण,पंचवटी के तीर।
देखे साधू वेश में,दो सुन्दर बलवीर।।
रूप देख मोहित हुई,जगी प्रेम की आस।
सुन्दर नारी वेश धर, गई राम के पास।।
रखा राम के सामने,शादी का प्रस्ताव।
किन्तु तनिक भी राम ने,दिया न उसको भाव।।
पहले से शादीशुदा,सीता से अति प्यार।
प्रेम निवेदन आपका, मुझे नहीं स्वीकार।।
मेरे छोटे भ्रात से,जाकर कर लो बात।
शायद वह दे दे तुम्हें, प्रेममयी सौगात।।
यह सुनकर शूर्पणखा,गई लखन के पास।
बोली लगते हो हमें,वीर बहुत तुम खास।।
हार गले में डालकर,रख लो अपने साथ।
पत्नी अपनी मानकर,थामो मेरा हाथ।।
पत्नी के होते हुए, कैसे करूं विवाह।
दो-दो रिश्ते साथ में, होंगे नहीं निबाह।।
धोखा दे सकता नहीं, छोड़ न सकता हाथ।
जिसने सुख दुख में दिया,सदा हमारा साथ।।
सुनकर बातें लखन की,समझ स्वयं अपमान।
झपटी सीता की तरफ,लेने उनकी जान।।
काट लखन ने तीर से,दिये नाक अरू कान।
भागी कानन की तरफ,छली दुष्ट शैतान।।
खर दूषण के सामने,कहा हृदय का हाल।
बोली बदला लो अभी,मन में बहुत मलाल।।
सेना लेकर राम से, होकर भारी क्रुद्ध।
खर दूषण करने चले,राम लखन से युद्ध।।
धनुष हाथ संधान कर, छोड़ एक ही बाण।
राम लखन ने हर लिए,खर दूषण के प्राण।।
होकर बहुत हताश फिर, गई दशानन पास।
रो-रो कर कहने लगी,मेटो मन की त्रास।।
देखा रावण ने बुरा, चन्द्रनखा का हाल।
गुस्से के मारे हुए,नयन क्रोध से लाल।।
किस पापी ने किया है,बुरा तुम्हारा हाल।
खाल खींच लूंगा बहन,उसकी मैं तत्काल।।
मार दहाड़े जोर से,कहा हृदय का हाल।
नाक कान मम काट कर,किया मुझे बेहाल।
राम लखन दो नाम के,वन में रहते वीर।
काट उन्हीं ने लिए है, नाक कान मम तीर।।
राम लखन के संग में,इक है सुन्दर नारि।
जिसका रूप अनूप है,सकल सुखों की सारि।।
उसका कर लाओ हरण,तभी मिलेगा चैन।
ले बदला अपमान का, भ्रात जुड़ाओ नैन।।
राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)








