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लक्ष्मीबाई

बुंदेलखंड की धरती बोलै, गाथा आज सुनावैं,
झाँसी वाली रानी की हम, वीर कहानी गावैं।

जब फिरंगी ललकारत आए, धरती माँ अकुलाई,
तब झाँसी की छोरी बनिके, रण में सिंहिन धाई।

माथे तिलक, कटार कमरिया, आँखन ज्वाला धार,
देखत ही गोरे थर-थर काँपें, टूट गयो अहंकार।

कहैं मनु, “मैं हार न मानूँ, जब तक प्राण रहैं”,
माटी खातिर सीस कटे तो, जनम सफल हम कहैं।

घोड़ा “बादल” उड़त पवन सम, धूरा खूब उड़ाय,
एक हाथ तलवार चमकत, दूजे बालक लाय।

छम-छम बाजैं पाँवन पायल, खन-खन करैं कटार,
रनभेरी जब गूँजी रण में, काँप उठो दरबार।

“खूब लड़ी मर्दानी” कहिके, जग ने मान बढ़ायो,
झाँसी वाली रानी नै तो, इतिहास अमर बनायो।

बुंदेली माटी की बिटिया, लाज बचावन आई,
दुश्मन के छक्के छुड़वाय दए, ऐसी रणचंडी छाई।

बरछी, भाला, ढाल उठाय के, सैनिक संग पुकार,
“जय भवानी!” गूँजी अंबर में, टूटे शत्रु-द्वार।

रकत रंग से लिख दी गाथा, वीरन की पहचान,
नारी केवल कोमलता नाहीं, शक्ति रूप भगवान।

आजौ झाँसी किला कहत है, सुनो समय के पार,
रानी जइसन हिम्मत राखो, मत मानो तुम हार।

बुंदेलों की बोली गावत, एकई बात बताय—
माटी, मान, स्वतंत्रता खातिर, जीवन दै दो जाय।

शशि धर कुमार
कटिहार, बिहार

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