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भाग्य का लेखा

बंधक रखे खेत को उसने जोता होता,
कितनी आशाओं को उसमें बोता है।
माथे पर पसीना, आँखों में जल,
फिर भी धरती से माँगता कल।

होना था जो, वह मेरे साथ हुआ,
विधि का लिखा कोई मिटा न सका।
हँसकर सहा जो नियति ने दिया,
चुपचाप सब कुछ स्वीकार किया।

पर जो न होना था वह भी होता है,
बिन बादल बरसात यों ही रोता है।
बिना ऋतु के पतझड़ आ जाता,
बिना दोष के दंड भी पा जाता।

यह जीवन भी बंधक खेत समान,
हम सब इसमें जोतें अनजान।
आशा के बीज नित्य बोते हैं,
फल क्या मिलेगा, विधि जाने है।

तो भी किसान सा मन रखो धीर,
कर्म करो, रखो मन को गंभीर।
जो होगा सो होगा, चिंता कैसी,
अपनी भूमि जोतते जाओ ऐसी।

सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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