
शौक है तन्हाइयों का।
क्या करें शहनाइयों का।
दूरियों के इस सफ़र में,
साथ है परछाइयों का।
इन परिंदों को भी थोड़ा,
ख़ौफ है ऊंचाइयों का।
नीतियाँ थोथी पड़ी हैं,
ढोंग है अच्छाइयों का।
बेहयाई दौर में अब,
डर नहीं रुसवाइयों का।
झूठ हैं अंज़ाम सारे,
नाम है सच्चाइयों का।
छोड़ भोलापन पुराना,
दौर है चतुराइयों का।
नवीन माथुर पंचोली











