
मानसून के रंग निराले हैं,
हर बूंद में सौ उजियाले हैं,
सूखी धरती की प्यास बुझाकर,
ये जीवन के नए हवाले हैं।
कभी रिमझिम बन गीत सुनाए,
कभी बादल बन शोर मचाए
भीगी मिट्टी की सौंधी खुशबू,
बचपन की गलियों तक ले जाए।
पत्तों पर मोती-सी बूँदें,
मन के आँगन दीप जलाएँ,
टूटी उम्मीदों की शाखों पर,
फिर से सपनों के फूल खिलाएँ।
मानसून केवल ऋतु नहीं है,
यह प्रकृति का कोमल स्पर्श है,
जो पत्थर-से हो चुके दिलों में,
भर देता फिर जीवन का हर्ष है।
हर बिजली का चमकता चेहरा,
हिम्मत का संदेश सुनाता है
हर काली रात के पीछे भी,
इंद्रधनुष मुस्कुराता आता है।
भीगें इन रंगों में ऐसे,
कि मन का हर मैल धुल जाए,
मानसून की हर बूंद हमें,
प्रेम, करुणा और उम्मीद जग जाए।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













