
डराती थी तनहाइयां मुझको अक्सर
यादों से तेरी यह महफिल सजाई है।
गम-ए-जिंदगी हो जाए ना रुसवा
ये जमाना कमबख्त बड़ा सौदाई है।
थमा के दर्द की डोर मेरे हाथों में
जाने किस ओर मुड़ गए हो तुम।
राह तकती रही तुम्हारे लौटने का
वक्त ने भी खूब किस्मत आजमाई है।
तेरे आने की भनक दी बारिश की बूंदों ने
फिजा ने भी आज ली खूब अंगड़ाई है।
चिराग-ए-शमा रोशन हुई है राहों में
आज फिर लगा मौसम में बहार आई है।
नगमा-ए-गम हो चली थी ये जिंदगी
मुद्दतों से जिंदगी आज फिर गुनगुनाई है।
दीदार-ए-सुकून चाहती थी ये नज़र
बड़े अरसे से मसरत की घड़ी आई है।
उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)













