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खुशियों की खिड़की

खुशियों की खिड़की जैसे खुली, उजियारा देखो बोल पड़ा,
सूना-सा हर एक कोना फिर, सपना बनकर डोल पड़ा।

हर सुबह उम्मीदों की चिड़िया आँगन में गाने लगती,
मन का सूखा पेड़ भी देखो, पत्तों से फिर तोल पड़ा।

नफ़रत की दीवारें टूटीं, प्यार की ख़ुशबू महकी यूँ,
एक मुस्कान के आने से, हर ग़म का मौसम ढल पड़ा।

छोटी-छोटी बातों में भी जीवन का उत्सव मिलता है,
बूँद गिरी तो प्यासा सावन मोती बनकर घुल पड़ा।

जिसने बाँटी प्रेम की दौलत, वही सदा धनवान रहा,
लोभ के पीछे भागने वाला, अपने ही में डोल पड़ा।

दिल की खिड़की खुली रहे तो रौशन रहता है हर पल,
अँधियारा भी हार गया जब, आशा का दीपक जल पड़ा।

“राही” बस इतना सीखा है, जीवन का सुंदर फल यही
खुशियों की खिड़की खोलो तो, हर दिल में एक फूल खिला।

         रीना पटले शिक्षिका 
 शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई 
       जिला सिवनी मध्यप्रदेश

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