
क्रूरता की आग न बुझाई गई वक्त पे,
तो देश की अखंड अस्मिताएं मारी जाएंगी।
दुखों के मगरमच्छ हावी होते रहेंगे तो,
सुखों की सजल सरिताएं मारी जाएंगी।
कवि की कलम कल्पना के गीत रचेगी तो,
काल के करों से कविताएं मारी जाएंगी।
दोषियों को दर्दनाक दंड न दिया तो फिर,
रोज रोज हमारी सुताएं मारी जाएंगी।
सीमाओं पर अगर सैनिक अकेले लड़ेंगे,
और हम घर में चैन से सोते रहेंगे,
तो सरहद की हर ईंट मारी जाएगी,
तिरंगे की हर शान मारी जाएगी।
न्याय के मंदिर में अगर सौदे होंगे,
सच के गवाह अगर खरीदे जाएंगे,
तो कानून की किताब मारी जाएगी,
संविधान की हर दुहाई मारी जाएगी।
शिक्षा के मंदिर अगर धंधे बन गए,
गुरु का सम्मान अगर बिकने लगा,
तो कलम की ताकत मारी जाएगी,
आने वाली नस्लों की उड़ान मारी जाएगी।
धर्म के नाम पर अगर जहर घोला गया,
इंसानियत को अगर मजहब में तोला गया,
तो गंगा-जमुनी तहजीब मारी जाएगी,
“वसुधैव कुटुंबकम” की रीत मारी जाएगी।
इसलिए अब हमें और चुप नहीं रहना है ,
कलम से,आवाज से,लहू से लिखना है।
वरना आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी,
“जब आग लगी थी, तब तुम क्या कर रहे थे?”
जगो… वरना सब मारा जाएगा।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













