
इंसानी ये फ़ितरत होती है अपना पराया अंतस का भेद होता है
अपने रिश्ते तो अपने होते हैं मगर पराई पीड़ा का मर्म हमेशा जुदा होता है
रिश्ते सदा रहते है फर्क आपके अंतकरण मे होता है
स्वार्थता की इस दुनियाँ मे माओं मे भी फर्क होता है
झूठी नापाक दुनियाँ मे प्रेम अपनों का बेदिल रिश्ते हो गये
अपना अपना के स्वार्थ मे परिवार लगभग खतम हो गये
स्वार्थ की पराकाष्ठा मे घर बाहर लोगों का एक दूजे पर विश्वास अब जाता रहा
अच्छाई अपनापन का वजूद भी अब संदेह के तराजू मे तोला जा रहा
विश्वास का आलम है रिश्तों की गहराई भी अब सूख रही है
इंसानी नज़रिया ऐसा मानो अपनों की नही धरती की जुदाई हो रही हैं
खाली घर खाली ये जहाँ हो गया है
मूर्ख इंसान अपनों मे ही तन्हा हो गया है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













