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अंतस का भेद

आज शर्मसार हो रहे हैं रिश्ते
जिंदगी मानो बन गई हो खेल।
झूठी मुस्कानों के नकाब इस कदर
कैसे जाने कोई अंतस का भेद।

किसको दिखे यहां पराई पीड़ा
स्वार्थ में इस कदर हो चले हैं अंधे।
झूठी नापाक मोहब्बत का ढोंग,
रचाकर निभाते हैं सब बेदिल रिश्ते।

सरेआम हो रहा रिश्तो का कत्लेआम।
रति भर भी इंसानियत नहीं रह गई।
अपनेपन का ओढ़ दुशाला
अपने ही रिश्तो का कत्ल कर गई।

मोहब्बत सीख हे! मानव प्रकृति से कैसे
सह न सकी पानी की बूंद धरती से जुदाई
निभाने अपनेपन का रिश्ता
वापस बारिश बनकर धरती पर आई।

उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)

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