
संघर्षों से जब अंतर्मन टूटा,
तो सुख आकर करेगा क्या।
मन की हरियाली सूख गई,
अब सावन आकर करेगा क्या।
जब मान न मिला जीवन में,
तो दीर्घ आयु किस काम की।
सारा जीवन रो-रोकर बीता,
अब खुशी भी आए तो हँसेगा क्या।
रूप न मिला, रंग न मिला,
जीने का कोई ढंग न मिला।
बिन पतवार लहरों में खोया,
अब किनारा लाकर करेगा क्या।
सोचा था सच जीत जाएगा,
क्या मालूम झूठ अव्वल होगा।
मन की ज्योति बुझ गई जब,
अब दीप जलाकर करेगा क्या।
चाह थी सूरज-सा बनूँगा,
चाँद-सा जग में चमकूँगा।
जीवन की साँझ आ पहुँची,
अब डूबता सूरज करेगा क्या।
मन कह रहा—मत हार, चल उठ,
जब तक साँसें शेष हैं तन में।
अब तो साँसें भी थककर बैठ रही,
फिर मंज़िल पाकर करेगा क्या।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड













