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सावन

सावन आया द्वार,गगन छाए घन काले।
रिमझिम बरसे मेह,हर्ष से झूमें डाले।।
खेत हुए गुलजार,हृदय किसान मुस्काता ।
पाकर मेहनत मान,अन्न से जग भर जाता।।

कोयल गाए तान, हवा मकरंद लुटाती।
हरियाली की ओढ़, धरा चुनरी लहराती।।
झूले पड़ते डाल, सखियाँ कजरी सुनाती।
सावन का उत्साह, सभी के मन हरषाती।।

शिव-मंदिर में भीड़, भक्त जलधारा लाएँ।
“हर-हर” गूँजे धाम, सभी मिल शिव-गुण गाएँ।।
बेल धतूरा दुग्ध, भक्त गण नित्य चढ़ाते।
सावन का यह मास, सभी के कष्ट मिटाते।।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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