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कविता

अगर दिल भी मिले दिल से नई पहचान हो जाए,
खिले विश्वास का उपवन, ये मन गुलदान हो जाए।

मिटे दुर्भाव की दीवार, हर इंसान मुस्काए,
मुहब्बत का दिया रोशन, नया अभियान हो जाए।

न हो ऊँचा कोई इतना, न कोई खुद को कम समझे,
सभी के दर्द का मरहम, यही सम्मान हो जाए।

कभी जो बात न कह पाए, निगाहें कह सकें उसको,
मधुर संवाद का रिश्ता सहज वरदान हो जाए।

कलम सच की अगर लिख दे, अँधेरों की सियासत पर,
हर इक अक्षर जन-मन का प्रखर एलान हो जाए।

वतन की शान के खातिर बढ़ें जब साथ सब मिलकर,
समर्पण की वही गाथा नया गुणगान हो जाए।

न लालच हो, न छल मन में, न वैराग्नि जले कोई,
धरा का कण-कण प्रेमिल सा मधुर उद्यान हो जाए।

‘सुमन’ जब प्रेम बोएगी हृदय की नम ज़मीं पर तो,
हर इक मौसम महकता-सा नया गुलिस्तान हो जाए।

पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद

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